Tuesday, 4 April 2023

पूज्यनीय रामचंद्र डोंगरे जी महाराज

एक ऐसे कथावाचक जिनके पास पत्नी के अस्थि विसर्जन तक के लिए पैसे नहीं थे ...तब मंगलसूत्र बेचने की बात की थी।

यह जानकर सुखद आश्चर्य होता है कि पूज्यनीय रामचंद्र डोंगरे जी महाराज जैसे भागवताचार्य भी हुए हैं जो कथा के लिए एक रुपया भी नहीं लेते थे 🙏 मात्र तुलसी पत्र लेते थे। 

जहाँ भी वे भागवत कथा कहते थे, उसमें जो भी दान दक्षिणा चढ़ावा आता था, उसे उसी शहर या गाँव में गरीबों के कल्याणार्थ दान कर देते थे। कोई ट्रस्ट बनाया नहीं और किसी को शिष्य भी बनाया नहीं।

अपना भोजन स्वयं बना कर ठाकुरजी को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करते थे।

डोंगरे जी महाराज कलयुग के दानवीर कर्ण थे।

उनके अंतिम प्रवचन में चौपाटी में एक करोड़ रुपए जमा हुए थे, जो गोरखपुर के कैंसर अस्पताल के लिए दान किए गए थे।-स्वंय कुछ नहीं लिया|

डोंगरे जी महाराज की शादी हुई थी। प्रथम-रात के समय उन्होंने अपनी धर्मपत्नी से कहा था- 'देवी मैं चाहता हूं कि आप मेरे साथ 108 भागवत कथा का पारायण करें, उसके बाद यदि आपकी इच्छा होगी तो हम ग्रहस्थ आश्रम में प्रवेश करेंगे'।

इसके बाद जहाँ -जहाँ डोंगरे जी महाराज भागवत कथा करने जाते, उनकी पत्नी भी साथ जाती।108 भागवत पूर्ण होने में करीब सात वर्ष बीत गए।

तब डोंगरे जी महाराज पत्नी से बोले-' अब अगर आपकी आज्ञा हो तो हम ग्रहस्थ आश्रम में प्रवेश कर संतान उत्पन्न करें'।

इस पर उनकी पत्नी ने कहा,' आपके श्रीमुख से 108 भागवत श्रवण करने के बाद मैंने गोपाल को ही अपना पुत्र मान लिया है, इसलिए अब हमें संतान उत्पन्न करने की कोई आवश्यकता नहीं है'।

धन्य हैं ऐसे पति-पत्नी, धन्य है उनकी भक्ति और उनका कृष्ण प्रेम।

डोंगरे जी महाराज की पत्नी आबू में रहती थीं और डोंगरे जी महाराज देश दुनिया में भागवत रस बरसाते थे। 

पत्नी की मृत्यु के पांच दिन पश्चात उन्हें इसका पता चला।
वे अस्थि विसर्जन करने गए, उनके साथ मुंबई के बहुत बड़े सेठ थे- रतिभाई पटेल जी |  
उन्होंने बाद में बताया कि डोंगरे जी महाराज ने उनसे कहा था ‘कि रति भाई  मेरे पास तो कुछ है नहीं और अस्थि विसर्जन में कुछ तो लगेगा। क्या करें’ ?

फिर महाराज आगे बोले थे, ‘ऐसा करो, पत्नी का मंगलसूत्र और कर्णफूल- पड़ा होगा उसे बेचकर जो मिलेगा उसे अस्थि विसर्जन क्रिया में लगा देते हैं’।

सेठ रतिभाईपटेल ने रोते हुए बताया था....
जिन महाराजश्री के इशारे पर लोग कुछ भी करने को तैयार रहते थे, वह महापुरुष कह रहा था कि पत्नी के अस्थि विसर्जन के लिए पैसे नहीं हैं। 
    
हम उसी समय मर क्यों न गए l
फूट फूट कर रोने के अलावा मेरे मुँह से एक शब्द नहीं निकल रहा था।

*ऐसे महान विरक्त महात्मा संत के चरणों में कोटि-कोटि नमन भी कम है।

Saturday, 1 April 2023

🌷 धम्म का प्रसार 🌷

🌷 धम्म का प्रसार 🌷
✍️ वर्तमान समय में वही साधना जिसका भगवान बुद्ध ने आज से 2500 वर्ष पहले प्रशिक्षण दिया था, केवल ब्रह्मदेश में गुरु-शिष्य परंपरा से अक्षुण्ण रूप से जीवित रही और आज पुनः पल्लवित पुष्पित हो रही है और आज भी वैसे ही परिणाम आ रहे है जैसे कि उस समय आते थे। भारत तथा विश्व के अनेक देशों के हजारों लोग, हर तबके के नर-नारी 'विपश्यना' सीख रहे हैं….🙏🙏🙏

ऐतिहासिक तथ्यों से ज्ञात होता है कि भगवान के जीवनकाल में सम्राट बिंबिसार, महाराज शुद्धोदन और महाराज प्रसेनजित आदि स्वयं धर्म धारण करके अत्यंत लाभान्वित हुए इसलिए स्वभावतः वे इसमें अनेकों को भागीदार बनाना चाहते थे। उन्होंने अपने-अपने साम्राज्यों में भगवान की शिक्षा के प्रसार में उत्साहपूर्वक सहायता की। 

परंतु वास्तव में जन-जन में धर्म का प्रसार केवल राजकीय संरक्षण के कारण नहीं, बल्कि धर्म के अपने तत्काल लाभकारी परिणामों के कारण हुआ। यह विधि दुःख विमुक्ति के लिए अभ्यासरत साधक के चित्त से लोभ, द्वेष और मोह के सभी विकारों का निर्मूलन कर देती है। यह एक सहज, सार्वजनीन विधि है, जिसका अभ्यास किसी भी वर्ग, जाति अथवा संप्रदाय के स्त्री या पुरुष द्वारा किया जा सकता है और सबको समान परिणाम मिलते हैं । 

दुःख सार्वजनीन है। अनचाही होती रहती है। मनचाही कभी होती है और कभी नहीं भी होती है। किसी भी सार्वजनीन रोग का सार्वजनीन उपचार ही होना चाहिये। धर्म ही वह उपचार है। बुद्ध ने करुणा से भरकर, मुक्त हस्त से इसे पूरे उत्तर भारत (मज्झिम देश) में बांटा, जिससे वहां के लोग बहुत बड़ी संख्या में आकर्षित हुए। 

इसी तरह भगवान के जीवनकाल के बाद, ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में, सम्राट अशोक के शासनकाल में धर्म का खूब प्रसार हुआ। अशोक के शिलालेख इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि लोगों के द्वारा इस विद्या का व्यावहारिक उपयोग करने के कारण ही ऐसा हुआ। स्वयं अशोक ने निश्चित रूप से इसके कल्याणकारी प्रभाव को अनुभव किया होगा, तभी तो उसने धर्मप्रसार का कार्य इतने बड़े उत्साह से किया। 

स्वयं लाभान्वित हुआ तभी लोगों की सेवा करने के अपने शुभ संकल्प के कारण ही ऐसा कर पाया, जो शुद्धचित्त की चेतना से ही संभव है और इसीलिए उसने जनता के भौतिक तथा आध्यात्मिक उत्थान के लिए इतना अथक प्रयास किया। सातवें शिलालेख में उसने इस कार्य में अपनी सफलता के दो कारण बतलाये हैं। 

प्रथम अपने राज्य में धर्म का शासन होना और दूसरा, जिस पर उसने अधिक बल दिया- वह था साधना अर्थात धर्म का स्वानुभूतिजन्य अभ्यास अर्थात व्यावहारिक पक्ष । इससे निष्कर्ष निकलता है कि उसने धर्म के सक्रिय अभ्यास को धर्म प्रसार का प्रमुख अशोक के संरक्षण में तीसरी धर्म संगीति के आयोजन के बाद धर्म को अधिक से अधिक लोगों तक सुलभ करने के लिए उत्तरी भारत के अन्य नौ क्षेत्रों में पूर्णतया विमुक्त हुए अरहत भिक्षुओं को भेजा गया। 

इन भिक्षुओं को धर्मदूत कहा जाता था। स्वभावतः उन्होंने धर्म के व्यावहारिक पक्ष को ही अधिक महत्त्व दिया, जिससे वे स्वयं चित्त के विकारों से मुक्त हुए थे। मैत्री और करूणा से जोत-प्रोत इन्होंने बहुत बड़ी संख्या में लोगों को मुक्ति के मार्ग की ओर आकर्षित किया। 

सम्राट अशोक द्वारा प्रेषित प्रमुख भिक्षुओं के नाम और नौ स्थान जहां पर दे धर्मशिक्षा हेतु गये, निम्न प्रकार है:- 

१) स्थविर मझांतिक-कश्मीर और गांधार (कश्मीर, अफगानिस्तान और उत्तरी पश्चिमी पाकिस्तान में पेशावर तथा रावलपिंडी) 

२) स्थविर महादेव - महिसमंडल (मैसूर) 

३) स्थविर योनक धम्मररिखत- अपरांतक (वर्तमान उत्तरी गुजरात, काठियावाड़, कहा और सिंध) 

४) स्थविर रक्खित- वनवासी (दक्षिण भारत में उत्तरी कन्नड़ प्रदेश) 

५) स्थविर महाधम्म रक्खित- महारट्ठ (गोदावरी के उद्गम के आसपास के महाराष्ट्र के भाग) 

६) स्थविर महारक्खित- योनकलोक (प्राचीन यूनान) 

७) स्थविर मझिम - हिमवंत प्रदेश (हिमालय क्षेत्र) 

८) स्थविर सोण और उत्तर- सुवण्ण भूमि (बर्मा) 

९) स्थविर महेंद्र तथा अन्य- ताम्बपन्निद्वीप, (ताम्रपर्णी द्वीप अर्थात श्रीलंका) 

अशोक ने सुदूरवर्ती क्षेत्रों, वर्तमान सीरिया और मिश्र तक आचार्यों को भेजा। उसने भावी पीडियों के लिए पूरे विश्व में धर्म प्रसार का मार्ग प्रशस्त उसके पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए सम्राट कनिष्क ने कुमारजीव और बोधिधम्म जैसे स्थविरों को मध्य एशिया और चीन भेजा।

वहां से चौथी शताब्दी के प्रारंभ में धर्म कोरिया पहुँचा और उसके बाद जापान में फैला। भारत में तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला जैसे कई धर्म-विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई एवं उनका विपुल विकास हुआ, जहां पर चीन जैसे सुदूरवर्ती देश के विद्वान भी आकर्षित हुए। 

धर्म का प्रसार संपूर्ण दक्षिणपूर्व एशिया तक हो गया। थाईलैंड, कंबोडिया, लाओस, वियतनाम तथा इंडोनेशिया में बहुत बड़ी संख्या में लोग इसको धारण करने लगे। शांतिरक्षित, पद्मसंभव, अतिश और कमलशील के द्वारा धर्म तिब्बत में भी पहुँच गया। परंतु कालांतर में इसका व्यावहारिक पक्ष प्रायः सभी देशों से लुप्त हो गया। 

वर्तमान समय में वही साधना जिसका भगवान बुद्ध ने आज से 2500 वर्ष पहले प्रशिक्षण दिया था, केवल ब्रह्मदेश में गुरु-शिष्य परंपरा से अक्षुण्ण रूप से जीवित रही और आज पुनः पल्लवित पुष्पित हो रही है और आज भी वैसे ही परिणाम आ रहे है जैसे कि उस समय आते थे। भारत तथा विश्व के अनेक देशों के हजारों लोग, हर तबके के नर-नारी 'विपश्यना' सीख रहे हैं। 

लोगों का धर्म के प्रति आकर्षण होने का कारण वही है जो आज से 2500 वर्ष पूर्व भी था - इस शिक्षा का अत्यंत व्यावहारिक स्वरूप, जो सुस्पष्ट है, सुस्पृश्य है, सांदृष्टिक है, कल्याणकारी है, सरल है, आशुफलदायी है और कदम-दर-कदम लक्ष्य की ओर ले जाता है। 

अब जब कि पुनः बहुत बड़ी संख्या में लोग धर्म का अभ्यास करने लगे हैं तो हम बुद्ध के जीवनकाल और बाद में अशोक के शासनकाल के समय का जनजीवन कैसा था, इसकी एक परिकल्पना कर सकते हैं। भविष्य में हम जैसे करोड़ों लोग धर्म को धारण करके मैत्री, करुणा विवेक और शांति में प्रतिष्ठित होते जायेंगे, अपने समाज के लिये भी शांतता व सामंजस्य से ओतप्रोत समाज की परिकल्पना कर सकते हैं। सबका मंगल हो, सब में शांति और सद्भावना बनी रहे। 

पुस्तक: गौतम बुद्ध, जीवन परिचय और शिक्षा ।
विपश्यना विशोधन विन्यास ॥

Friday, 31 March 2023

Experiential Wisdom—Paññā |

Experiential Wisdom—Paññā | Vipassana Research Institute.

What is paññā? Paññā is direct knowledge. It is the excellent knowledge that leads us to liberation. Paññā is not the knowledge gained merely by reading books or by listening to discourses. It is actual knowledge that is gained through our own experience. By constantly practising it, many unknown truths start manifesting themselves.

One truth which manifests itself is that the roots of all those saṅkhāras that lead to the lower worlds lie dormant in the deep unconscious mind. This becomes clear to a person sooner or later, depending on his stock of past pāramis. These harmful saṅkhāras that lead one to states of misery lie dormant and flow along with the life-stream. Therefore, they are called dormant defilements (anusaya kilesa).

Even if one eradicates these unwholesome saṅkhāras at the surface of the mind by means of any meditation technique, yet one does not attain total liberation from the lower worlds.

However, when a meditator maintains the practice of objective awareness towards all bodily sensations, he develops a progressively stronger ability to be free from craving because by means of wisdom, he experiences the truth that every sensation is impermanent and constantly changing. He does not generate craving or aversion towards these sensations. Thus, his awareness and equanimity become stronger and stronger.

Then the deep-rooted dormant saṅkhāras at the depth of the unconscious mind start coming up on the surface one after another, and when the meditator remains equanimous towards them, they start getting uprooted and eradicated and start decreasing. Thus, the meditator starts getting liberated from the lower worlds.

When all the dormant defilements (leading to the lower realms) have come to the surface and have been eradicated, one attains full liberation from the lower worlds.

Uppajjitvā nirujjhanti, tesaṃ vūpasamo sukho.
When saṅkhāras arise and get eradicated, one experiences the happiness of their cessation.

By practising Vipassana a meditator gains complete liberation from the saṅkhāras of the lower worlds. As one continues to observe these impermanent sensations, one experiences for the first time, the state of nibbāna, which is constant, eternal, stable and beyond the field of arising and passing away. This is the first stage of total liberation from the cycle of becoming. This is known as the stage of stream-entry (sotāpatti). Such a meditator has entered the stream of total liberation from the cycle of becoming. Now nobody can stop him from becoming fully liberated. He will be reborn in the higher worlds for seven lives at the most and will eradicate his entire stock of rebirth-producing saṅkhāras.

Visaṅkhāragataṃ cittaṃ taṇhānaṃ khayamajjhagā.
The mind becomes free of all saṅkhāras and is totally purified.

When taṇhā is eradicated, he does not generate new saṅkhāras. He attains the stage where:
Khīṇaṃ purāṇaṃ navaṃ natthi sambhavaṃ.
All old saṅkhāras have been eradicated; new saṅkhāras cannot be generated. Such a person is known as an arahat; one who is totally liberated from rebirth.

He declares the following truth:
Ayamantimā jāti—
This is my last birth.
Natthidāni punabbhavoti—
Now there shall be no more rebirth. 
(Dīghanikāyo 1.31, Bodhisattadhammatā)

Thus, he becomes totally liberated from birth and death in the cycle of becoming.

A meditator must strive diligently in order to attain all these stages.

Liberation cannot be bestowed by any god, goddess, brahmā or God Almighty. A true spiritual teacher will only say: 
I am a path-giver, not a giver of liberation.

As the Buddha said –
Tumhehi kiccaṃ ātappaṃ, akkhātāro tathāgatā. 
You have to strive for your liberation;
the Buddhas only show the path.

One who walks on this path cannot fall into the clutches of any guru out of blind faith. He understands: 
Attā hi attano nātho—
one is one’s own master. 
attā hi attano gati—
one makes one’s own destiny.

As he continues to practise Vipassana, certain truths about oneself become clear to a serious meditator.

First, it now becomes clear to him that, though he formerly believed that he was attached to intoxicants, gambling or sexual misconduct, the truth is that the attachment is not to them but to the sensations that they produce. Now, by this meditation, he objectively observes the arisen sensations associated with these addictions and gets rid of them. Thus he is free from generating such defiled saṅkhāras again.

Another truth also becomes very clear
—Pubbe hanati attānaṃ, pacchā hanati so pare. 
(Theragāthāpāḷi 139, Vasabhattheragāthā)

A serious meditator, whether a prisoner or not, observes that whenever he generates a thought of revenge in his mind, his body immediately starts burning. His heartbeat increases and he becomes tense and miserable. He begins to clearly understand that, before he can destroy the peace and harmony of another person, he destroys his own peace and harmony and makes himself miserable.

When a meditator experiences these truths, his nature starts to change. In place of hatred and ill-will, he generates love and goodwill. His mind is suffused with loving kindness and compassion. His life is filled with peace and happiness. His life becomes fruitful.

Such is the technique of Vipassana, which is based on experiential truth and is beneficial in every way.

This is the invaluable legacy which Buddha gave to the suffering world.

Bhavatu sabba maṅgalaṃ—May all beings be happy. 

{SD}
Source:
https://www.vridhamma.org/node/2381

Friday, 17 March 2023

आचार्य गोयन्काजी द्वारा सिखायी गयी विपश्यना साधना विधि संबंधी प्रश्न - उत्तर

🌷 सयाजी उ बा खिन की परंपरा में आचार्य गोयन्काजी द्वारा सिखायी गयी विपश्यना साधना विधि संबंधी प्रश्न - उत्तर 🌷

1) शिविर की अवधि दस दिन की क्यों है?

वास्तव में दस दिन भी कम हैं। यह शिविर साधना की आवश्यक भूमिका एवं नींव डालता है। साधना में प्रगति करना जीवन भर का काम है। कई पिढियों का अनुभव है कि यदि साधना को दस दिन से कम में सिखाने जाए तो साधक विधि को अनुभूति के स्तर पर ठीक से ग्रहण नहीं कर पाता। परंपरा के अनुसार विपश्यना (Vipassana) को सात सप्ताह के शिविरों में सिखाया जाता था। बीसवीं सदी कि शुरुआत में इस परंपरा के आचार्यों ने जीवन की द्रुत गति को ध्यान में रखते हुए इस अवधि को कम करने के प्रयोग किए। उन्होंने पहले तीस दिन, फिर दो सप्ताह, फिर दस दिन एवं सात दिन के शिविर लगाए और देखा कि दस दिन से कम समय में मन को शांत कर शरीर एवं चित्त धारा का गहराई से अभ्यास करना संभव नहीं है

2) दिन में मैं कितने घंटे ध्यान करूंगा?

दिन की शुरुआत सुबह चार बजे जगने की घंटी से होती है और साधना रात को नौ बजे तक चलती है। दिन में लगभग दस घंटे ध्यान करना होता है लेकिन बीच में पर्याप्त अवकाश एवं विश्राम के लिए समय दिया जाता है। प्रतिदिन शाम को आचार्य गोयंकाजी का वीडियो पर प्रवचन होता है जो साधकों को दिन भर के साधना अनुभव समझने में मदत करता है। यह समय सारिणी पिछले कई दशकों से लाखों लोगों के लिए उपयुक्त एवं लाभदायी सिद्ध हुई है।

3) शिविर में कौनसी भाषा का उपयोग होता है?

साधना की शिक्षा आचार्य गोयंकाजी के हिंदी एवं अंग्रेजी में रिकॉर्ड किए गए निर्देशों द्वारा दी जाती है। इनके अनुवाद विश्व की कई प्रमुख भाषाओं में उपलब्ध हैं। अगर शिविर संचालन करने वाले सहायक आचार्य प्रादेशिक भाषा को नहीं जानते तो अनुवादक का प्रबंध किया जाता है। सामान्यतया शिविरार्थी के लिए भाषा कोई बाधा नहीं होती। अगर शिविर संचालन करने वाले सहायक आचार्य प्रादेशिक भाषा को नहीं जानते तो अनुवादक का प्रबंध किया जाता है। सामान्यतया शिविरार्थी के लिए भाषा कोई बाधा नहीं होती।

4) शिविर का शुल्क कितना है?

विपश्यना शिविर में हर साधक पर आनेवाला खर्च उसके लिए पुराने साधक का उपहार है, दान है। शिविर में रहने का, खाने-पीने का, शिक्षा का कोई शुल्क नहीं लिया जाता। विश्व भर में सभी विपश्यना शिविर स्वेच्छा से दिए गए दान पर चलते हैं। यदि शिविर की समाप्ति पर आपको लगता है कि साधना से आपको कुछ लाभ हुआ है तो आप भविष्य में आने वाले साधकों के लिए अपनी इच्छा एवं अपने सामर्थ्य के अनुसार दान दे सकते हैं।

5) शिविर संचालन के लिए सहायक आचार्यों को कितना पारिश्रमिक दिया जाता है?

सहायक आचार्यों को कोई वेतन, दान अथवा भौतिक लाभरूपी पारिश्रमिक नहीं दिया जाता। अतः उनकी जीविका का साधन अलग होना चाहिए। इस नियम के कारण कई सहायक आचार्य कम समय निकाल पाते है, लेकिन यह नियम साधक का शोषण एवं शिक्षा का व्यवसायीकरण होने से बचाता है। इस परंपरा के आचार्य केवल सेवा भाव से काम करते हैं। शिविर की समाप्ति पर साधकों को लाभ हुआ है, इस का समाधान ही उनका पारिश्रमिक होता है।

6) मैं पालथी मार कर नहीं बैठ सकता। क्या मैं फिर भी ध्यान कर सकता हूं?

निश्चित रूप से। जो साधक आयु के कारण अथवा कोई शारीरिक रोग के कारण पालथी मारकर नहीं बैठ सकते उनके लिए कुर्सियों का प्रबंध रहता है।

7) मुझे विशेष भोजन आवश्यक है। क्या मैं अपना खाना साथ ला सकता हूं?

अगर आपके डॉक्टर ने आपको किसी विशेष आहार की सलाह दी है तो हमें सूचित करें। हम देखेंगे कि क्या हम वह उपलब्ध करा सकते हैं। यदि भोजन अत्यंत विशेष है या ऐसा है जिससे कि साधना में बाधा आ सकती है तो आपको कुछ देर रुकने के लिए कहा जा सकता है, जब तक की आपके भोजन के निर्बंध कम हो। हम क्षमा चाहते हैं लेकिन यह नियम है कि साधकों को व्यवस्थापन द्वारा दिये गये भोजन में से ही अपना भोजन लेना होता है। वे अपना भोजन साथ नहीं ला सकते। अधिकतर साधक पाते हैं कि शिविर में भोजन के पर्याप्त विकल्प होते हैं एवं वे शुद्ध शाकाहारी भोजन का आनंद लेते हैं।

😎 क्या गर्भवती महिलाएं शिविरों में आ सकती हैं? क्या उनके लिए कोई विशेष प्रबंध अथवा निर्देश होते हैं?

गर्भवती महिलाएं शिविर में भाग ले सकती है। कई गर्भवती महिलाएं तो उस समय इसलिए शिविर में आती हैं कि उस विशेष समय में मौन रहते हुए गंभीरता से साधना कर सकें। हम गर्भवती महिलाओं से निवेदन करते हैं कि वे शिविर में आने से पहले यह निश्चित कर ले कि गर्भ स्थिर है। उन्हें आवश्यकतानुसार पर्याप्त भोजन दिया जाता है एवं आराम से साधना करने के लिए कहा जाता है।

9) शिविर में मौन क्यों होता है?

शिविर के दौरान सभी साधक आर्य मौन यानी शरीर, वाणी एवं मन का मौन रखते हैं। वे अन्य साधकों से संपर्क नहीं करते। साधकों को अपनी जरुरतों के लिए व्यवस्थापन से एवं साधना संबंधी प्रश्नों के लिए सहायक आचार्य से बात करने की छूट होती है। पहले नौ दिन मौन का पालन करना होता है। दसवें दिन सामान्य जीवन प्रक्रिया में लौटने के लिए बात करना शुरु करते हैं। इस साधना में अभ्यास की निरंतरता ही सफलता की कुँजी है। मौन इस निरंतरता को बनाए रखने हेतु आवश्यक अंग है।

10) मैं कैसे जान पाऊंगा कि मुझमें साधना करने की योग्यता है?

एक शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति जो सचमुच साधना करना चाहता है एवं उसके लिए पर्याप्त प्रयत्न करता है उसके लिए आर्य मौन सहित विपश्यना साधना कठिन नहीं है। अगर आप निर्देशों को निष्ठा से एवं धैर्यपूर्वक पालन करते है तो अच्छे परिणाम आयेंगेही। यद्यपि दिनचर्या कठिन लगती है, न वह बहुत कठोर है न बहुत आरामप्रद। इसके अलावा अन्य साधकों की उपस्थिति, जो शांतिपूर्वक वातावरण में गंभीरता से ध्यान कर रहे हैं, साधक के प्रयत्नों को मददगार होती है।

11) क्या विपश्यना डिप्रेशन को दूर करती है?

विपश्यना का उद्देश्य बीमारी को ठीक करना नहीं है। जो कोई भी विपश्यना का ठीक अभ्यास करता है वह हर स्थिति में संतुलित एवं प्रसन्न रहना सीख जाता है। लेकिन किसी को गंभीर डिप्रेशन का रोग है तो वह साधना ठीक से नहीं कर पायेगा एवं उचित लाभ से वंचित रह जायेगा। ऐसे व्यक्ति को चाहिए कि वह डाक्टरी सलाह लें। विपश्यना के आचार्य अनुभवी साधक जरूर हैं लेकिन मनोचिकित्सक नहीं।

12) क्या विपश्यना किसीको मानसिक रूप से असंतुलित कर सकती है?

नहीं। विपश्यना जीवन के हर उतार-चढाव में सजग, समतावान यानी संतुलित रहना सिखाती है। लेकिन यदि कोई अपनी गंभीर मानसिक समस्याओं को छिपाता है, तो वह विधि को ठिक से समझ नहीं पायेगा एवं ठिक से साधना न कर पाने के कारण उचित लाभ नहीं प्राप्त कर पायेगा। इसलिए यह आवश्यक है कि आप हमें आपकी मानसिक समस्याओं के बारे में ठीक से जानकारी दें ताकि हम सही निर्णय ले पायेंगे कि क्या आप शिविर से पर्याप्त लाभ उठा पायेंगे या नहीं।

13) किसे साधना में भाग नहीं लेना चाहिए?

यदि कोई शारीरिक रूप से इतना कमजोर है कि दिनचर्या का पालन नहीं कर सकता, तो उसे शिविर से पर्याप्त लाभ नहीं होगा। यही बात मानसिक रोगी या अत्यंत कठिन मानसिक तुफानों में से गुजर रहे व्यक्ति पर भी लागू है। सामान्यतया, बातचीत करके हम यह पता लगा सकते है कि क्या कोई व्यक्ति शिविर से उचित लाभ ले पायेगा या नहीं। कुछ साधकों को हम शिविर में बैठने के पूर्व डॉक्टरों से अनुमति लेनेके लिए भी कह सकते हैं।

14) क्या विपश्यना शारीरिक एवं मानसिक व्याधियों का इलाज कर सकती है?

कई बीमारियां मानसिक तनावों के कारण होती है। अगर तनाव दूर किया जायं तो रोग भी दूर हो जायेगा या कम हो जायेगा। परंतु यदि रोग को दूर करने के उद्देश्य से विपश्यना की जाय तो लाभ नहीं होता। जो साधक ऐसा करते है वे अपना समय बरबाद करते है, क्यों कि वे गलत उद्देश्य रखते हैं। वे अपनी हानि भी कर सकते हैं। न तो वे साधना को ही ठीक से सीख पाते हैं, न ही बीमारी से छुटकारा पाने में सफल होते हैं।

15) क्या विपश्यना सीखने के लिए बौद्ध बनना पडेगा?

विभिन्न संप्रदायों के लोग एवं वे भी जो किसी संप्रदाय में विश्वास नहीं रखते, सभीने विपश्यना को लाभदायक ही पाया है। विपश्यना जीवन जीने की कला है। यह भगवान बुद्ध की शिक्षा का सार है लेकिन यह कोई संप्रदाय नहीं है। वरन यह मानवी मूल्यों के संवर्धन का उपाय है जो अपने एवं औरों के लिए हितकारी है।

16) पूरे दस दिन तक शिविर में रहना क्यों आवश्यक है?

विपश्यना एक एक कदम सिखायी जाती है। शिविर के अंत तक हर रोज एक नया आयाम जोड़ा जाता है। यदि आप इसे बीच में छोड़ देते हैं तो पूरी शिक्षा नहीं ग्रहण करेंगे। आप इस साधना को लाभ देने का अवसर नहीं देंगे। गंभीरता से काम करने पर साधक एक प्रक्रिया शुरु करता है जो शिविर की समाप्ति में ही परिपूर्ण होती है। इस प्रक्रिया को बीच में ही रोक देना उचित नहीं।

17) क्या शिविर को बीच में छोड़ देना खतरनाक है?

शिविर को बीच में छोड कर आप अपने आपको साधना पूरी तरह सीखने का अवसर नहीं देते। इस कारण आप दैनिक जीवन में इसका उपयोग नहीं कर पायेंगे। आप इस प्रक्रिया को बीच में रोक देते है। बीच में शिविर छोडने से आप जो समय आप दे चूके है, वह व्यर्थ गँवा देते हैं।

 18) दसवें दिन जब कि मौन खुल गया है एवं गंभीर साधना समाप्त हो गयी है, क्या तब मैं जा सकता हूं?

शिविर के बाद सामान्य जीवन में जाने के लिए दसवां दिन एक परिवर्तन (ट्रान्जीशन) दिवस है। साधक को उस दिन जाने की अनुमति नहीं दी जाती!

🌷 Note :

विपश्यना ध्यान पद्धति द्वारा मन स्वयं की साँस ,शरीर और शरीर की संवेदनाओं के आधार पर एकाग्र होता है ।

भगवान बुद्ध उन दिनों प्रचलित अनेक ध्यान -विधियों में से इसे खोजा और निर्वाण प्राप्त किया। यह विधि सरल एवं वांछित फल देने वाली है । इस में कोई बाहरी आलम्बन नहीं लिया जाता , अपितु ऐसे आलम्बन के सहारे मन स्थिर किया जाता है ,जो सब के लिए मान्य हो । अपना स्वयं का श्वास ,अपना शरीर और अपने शरीर पर होने वाली संवेदनाएं सब के लिए समान रूप से सुलभ आलम्बन है। किसी भी नाम या मंत्र का जाप नहीं , किसी भी शब्द या वस्तु का सहारा नहीं। इसका सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि अपना मन किसी बाहरी आलम्बन में उलझता नहीं ,मन स्वयं की साँस ,शरीर और शरीर की संवेदनाओं के आधार पर एकाग्र होता है। 

अत: मन के विकार सहज रूप से दूर होने लगते हैं। ऐसी एकाग्रता प्राप्त होने पर हम वर्तमान में जीना सीख जाते हैं। संवेदनाओं के प्रति राग- द्वेष न जगाकर मात्र द्रष्टा -भाव से देखने का प्रयास करते हैं। इस विधि के अभ्यास द्वारा सजग -सचेत होकर उन्हें द्रष्टा -भाव से देखने पर राग,द्वेष ,मोह आदि नहीं बनते ,साथ ही पुराने संग्रहीत भाव भी नष्ट होते जाते हैं। इस प्रकार यह ध्यान -पद्धति आत्म -कल्याण एवं निर्वाण प्राप्ति का सरल -सहज तथा सुखकर साधन है। रोग के कारण मनोविकार हैं ,इन्हें श्वांस-साधना से निर्विकार किया जा सकता है । 

( विस्तारपूर्वक जानकारी के लिये : 
http://www.dhamma.org/hi/about/qanda)

Wednesday, 15 March 2023

भगवान बुद्ध का सहज, सरल व सादा जीवन


*भगवान बुद्ध का सहज, सरल व सादा जीवन सभी भिक्षुओं व गृहस्थों के लिए श्रेष्ठ आदर्श है. ऐसा आदर्श और कहां ढूंढेंगे?*

*तथागत का रहनसहन, खानपान बहुत साधारण व सादगीभरा था. दिन में वह सिर्फ एक बार भोजन करते थे. अक्सर वह स्वयं भिक्षाटन के लिए गांव नगर में जाते और अपने भिक्षापात्र में ही भोजन करते थे*

    *बुद्धत्व प्राप्ति के बाद बीस वर्ष तक उन्होंने किसी गृहस्थ का दिया हुआ वस्त्र नहीं पहना l वह इधर उधर पड़े हुए वस्त्रों को इकट्ठा कर सिलाई कर चीवर बनाकर पहनते थे l*

   *एक बार बोधि राजकुमार ने भगवान बुद्ध व भिक्षु संघ को अपने यहां भोजन के लिए आमंत्रित किया. भगवान के स्वागत के लिए मार्ग में काफी दूर तक पांवड़ें (रेड कार्पेट) बिछाए और दोनों और पुष्प वर्षा के लिए तैयारी की l बुद्ध यह सब देख कर असहज महसूस करने लगे. उन्होंने बहुत विनम्रता से कहा कि वह इस तरह के विलासी मार्ग पर चलना स्वीकार नहीं करेंगे l साथ ही चल रहे सेवक भिक्षु आनंद ने राजकुमार से कहा "राजकुमार! यह पावड़ें मार्ग से हटा लो. तथागत इस पर नहीं चलेंगे."*

     *दरअसल तथागत सामान्य जनता के जीवन के बारे में विचार करते थे. वह भविष्य के मानव जगत के लिए सादगी भरे जीवन का आदर्श छोड़ना चाहते थे*

     *दैनिक जीवन में जितने कम साधनों व सुविधाओं में जीवन निर्वाह हो सकें, उतने ही बुद्ध को अधिक पसंद थे. अल्प, सुलभ ,निर्दोष- अर्थात बहुत कम जरुरत, सरलता से उपलब्ध हो और वस्तु या साधन में कोई दोष नहीं हो. वस्त्र भोजन आदि के बारे में उनका यही नियम था*

    *शाक्यमुनि बुद्ध को खुली जगह में रहना बहुत पसंद था अधिकतर रात को वह खुले में या पेड़ के नीचे बैठे ध्यान साधना करते थे. एक बार शिंशपा वन में बुद्ध विहरते थे l कड़ाके की सर्दी थी. धरती जानवरों के खुरों से उबड़ खाबड़ हो रही थी. लेकिन भगवान बुद्ध वहीं पत्तों के आसन पर बैठे हुए ध्यान में लीन थे l एक व्यक्ति वहां आकर उनसे पूछता है, भंते ! क्या आप सुख में हैं ? आप सिर्फ एक हल्का वस्त्र पहने हुए हैं. जमीन उबड़ खाबड़ है. पत्तियों का आसन भी बहुत पतला है. कड़ाके की सर्दी में ठंडी हवा चल रही है*

    *भगवान बुद्ध ने उत्तर दिया, "हां, मैं सुख से रहता हूं, संसार में जो सुख से रहने वाले मनुष्य हैं उनमें से मैं एक हूं*

 *सबका मंगल हो.... सभी प्राणी सुखी हो....सभी निरोगी हो*

         *प्रस्तुति: डॉ. एम एल परिहार, जयपुर*

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Sunday, 26 February 2023

Brief History of Sri Ramakrishna Temple at Belur Math

Brief History of Sri Ramakrishna Temple at Belur Math
It was Swamiji’s lifelong desire to preserve the mortal remains (holy ashes) of Sri Ramakrishna and enshrine it in a grand temple dedicated to him. This could not happen during Swamiji’s lifetime. So he installed Sri Ramakrishna in what is now known as the ‘old temple’. However, before leaving his body, Swamiji had a plan ready for a monumental temple.  Following his directions, Swami Vijnanananda, his brother disciple and a qualified civil engineer drew the plan. Though Swamiji did not live to see this temple, he assured that he would see it from ‘above’.

The foundation stone for the temple was laid by Swami Shivananda on 13 March 1929, Sri Ramakrishna’s birthday. For paucity of funds, the construction could not begin immediately. It started only after five years with substantial contributions from Miss Helen Rubel (also known as Bhakti) and Mrs. Anna Worcester (also known as Annapurna). By their munificence, these two American devotees have become inseparably connected with the history of Ramakrishna Math and Ramakrishna Mission, and have endeared themselves to all devotees of Sri Ramakrishna.

Before the construction began, the foundation site had to be shifted about a hundred feet from the original spot, as advised by engineers. Swami Vijnanananda, the then president of the Order, re-laid the foundation on 16 July 1935, the day of Guru-purnima. In the morning, he went to the shrine to seek Sri Ramakrishna’s blessings. The auspicious time fixed for laying the foundation was 8.15 am. He was known for his punctuality, but that day he spent a long time in the shrine. It was past 8.30 a.m. when he came out of the shrine. When asked about the delay he said, ‘What I shall do! Sri Ramakrishna did not allow me to take leave of him.’

On the foundation day too something mysterious happened. At the beginning of the ritual, Swami Vijnanananda stood in front of the picture of Sri Ramakrishna, decorated for the purpose, holding in his hands the arghya (flowers, sandal paste, vilva leaf, and so on) to be offered to Sri Ramakrishna. Then blew a gentle breeze that displaced the arghya from his hands and placed it right on the spot where it was to be offered to Sri Ramakrishna. It was as if Swamiji had offered this first arghya to the Master. Swami Vijnanananda then offered another arghya to the Master.

- The new temple was dedicated by Swami Vijnanananda on 14 January 1938, the day of Makara Sankranti.

Wednesday, 22 February 2023

भूमिपूजन

अपने यहां एक परंपरा है- भूमिपूजन होता है। शुद्ध धरम के रास्ते क्या भूमिपूजन होता है -भूमि का सम्मान इसी तरह किया जाता है कि तपते हैं उस भूमि पर बैठकर । तप करके जो शुद्ध तरंगें पैदा करेंगे, इससे बढ़कर कोई धरती सम्मानित नही हो सकती, पूजित नही हो सकती । तो इसीलिए यहाँ तपे, तप करके भूमि का सम्मान किया। अधिक से अधिक धरम की तरंगें इस भूमि पर स्थापित हों, इस वातावरण में स्थापित हों ताकि अधिक से अधिक लोगों का कल्याण हो, यही भूमिपूजन है। यही भूमि का सम्मान है।

जो भी साधक अब तक यहाँ तपते रहे है, अपना मैल उतारते रहे हैं, जिसका थोड़ा भी मैल उतर जाता है मन में मंगल-मैत्री जागती ही है कि जैसे मेरा कल्याण हुआ, जैसी सुख-शांति मुझे मिली, थोड़ी-सी ही मिली, ऐसी सुख-शांति, अधिक से अधिक लोगों को मिले। अधिक से अधिक लोगों के करम-बंधन टूटें। अधिक से अधिक लोगों को मुक्ति का रास्ता मिले। ऐसा मंगलभाव मन में जागता है, कि मैं उसमें कैसे सहायक हो सकूं ! 
अनेक प्रकार से सहायक हो सकता है - जिसके पास जो शक्ति है. उस शक्ति के बल पर सहायक हो सकता है। शरीर की सेवा करके सहायक हो सकता है। वाणी द्वारा सहायक हो सकता है। किसी के पास धन है, धन द्वारा सहायक हो सकता है। पर उन सबसे बढ़कर एक बहुत बड़ी सहायता होती है, तपकर सहायक होता है।
पुराना साधक इस धरती पर जितना तपेगा उतना ही अनेक लोगों के मंगल का कारण बनेगा।

गुरुदेव के जीवनकाल में देखते थे – कि अनेक लोग ऐसे जो निर्वाणीक अवस्था तक पहुचे हुये और उस अवस्था तक जो पहुँचता है वह जब जी चाहे, जितने समय के लिए जी चाहे, निवृणिक अवस्था की अनुभूति करता है। ऋण से मुक्त होना है तो कैसे हो सकते हो? और लोग अपनी ओर से शरीर-श्रम का दान दे करके, धन का दान दे करके, अन्य प्रकार से सहायता करके, अपने-अपने ऋण से मुक्त होने का प्रयत्न करेंगे। लेकिन इतने अच्छे तापस के लिए तो यही उचित है कि कम से कम समाह में एक बार यहां आ जाया करो और किसी शून्यागार में बैठ करके एक घंटे की निर्वाणक समाधि लेकर चले जाया करो। बस, हो गया! कितनी बड़ी सेवा हो गयी। सारा का सारा आश्रम उन धरम कि तरंगो से इतना अल्पवित हो उठेगा ! तो जो भी साधक जिस-जिस अवस्था तक पहुँचा है, जितना भी तपा है उतनी तरंगें पैदा करेगा ही।

शुन्यगार बना कर लोगों को उसमे जो तपने की सहूलियत दे रहे हैं, यह तो अपने आपमें बहुत पुण्य की बात है ही, पर उससे कही बड़े पुण्य कि बात यह होगी कि, हर साधक सप्ताह में एक बार यहां आकर के तपेंगे। यह अपने तप का दान है। अपने तप की तरंगों का दान है। वह इस धरती को खूब अधिक पकायेगा. खूब अधिक तपायेगा। जिससे कि जो भी व्यक्ति आये वह थोड़े ही श्रम से अधिक प्राप्त कर सके। अपने विकारों से युद्ध करने की मेहनत तो हर व्यक्ति को करनी पड़ेगी। लेकिन आसपास का वातावरण धर्म कि तरंगो से तरंगित है तो मेहनत आसान हो जायगी। बाहर की तरंगें अगर दृषित हैं तो बाधायें अधिक आयेंगी। भीतर की तरंगों से यानी अपने विकारों से भी लड़ रहा है और बाहर कि तरंगे भी ऐसी है जो पाँव खीचने वाली है, तो काम नही करने देती। उससे बचाव हो जायगा। बहुत बड़ा बल मिलता है, बहुत बड़ी सहायता मिलती है।

साधकों को चाहिए कि अपने भीतर मंगल मैत्री जगायें। अपना कल्याण तो है ही। जब आकर तपेंगे तब अपना कल्याण तो है ही । लेकिन उस तपने से और न जाने कितनो का कल्याण होगा। सदियों तक कल्याण होने वाला है। जहां धरम की तरंगे जगने लगी तो लोग अपने आप खीचते हुये चले आयेगे । इस स्थान पर धर्म अपने शुद्ध रूप में जितनी सदियों तक रहेगा, उतनी सदियों तक न जाने कितने लोग आयेगे, तपेंगे , अपना अपना कल्याण करेंगे।

इस समय जो भी तप रहे हैं, भविष्य में आकर जो भी तपेंगे उन सब का मंगल हो ! उन सब का कल्याण हो ! मुक्ति हो, उन सब की स्वस्ति मुक्ति हो!

कल्याण मित्र, स.ना.गोयंका.

नारियल की तीन आँखें: एक आध्यात्मिक और ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण

नारियल की तीन आँखें: एक आध्यात्मिक और ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण                           ● • (भाग-४) ● •  ● गुरु पूर्णिमा का दिन सन...